PilgrimageMythologyदेवप्रयाग: अद्वितीय सौंदर्य और आस्था का संगम

देवप्रयाग: अद्वितीय सौंदर्य और आस्था का संगम

देवप्रयाग :

भारत के पंच प्रयागों में से एक देवप्रयाग एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है। प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण देवप्रयाग का सौंदर्य अद्वितीय है। यह स्थान अलकनंदा और भागीरथी नदियों के संगम पर स्थित एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है। यहाँ पर अलकनंदा और भागीरथी नदियां आपस में मिलती हैं और दोनों नदियों की सम्मिलित धारा गंगा नदी कहलाती है। यहाँ आकर अलकनंदा और भागीरथी नदी के संगम पर दोनों नदियों के वियल को देखने का अनुभव अविस्मरणीय होता है।

देवप्रयाग मंदिर :

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देवप्रयाग यहाँ के प्राचीन मंदिर रघुनाथ मंदिर, चंद्रवदनी मंदिर और दशरथशिला मंदिर के लिए भी प्रसिद्ध है। देवप्रयाग का मुख्य मंदिर रघुनाथ मंदिर है। यह पर भगवान राम की विशाल मूर्ति स्थापित है। मंदिर के शिखर पर सोने का कलश है। शिखर के गर्भगृह में ही भगवान राम की मूर्ति स्थापित है। मूर्ति के दोनों चरणों तथा हाथों पर आभूषण व सिर पर सोने का मुकुट सुसज्जित हैं। भगवान श्रीराम के मूर्ति के तरफ सीता जी और दूसरी तरफ लक्ष्मण की मूर्ति स्थापित है। मंदिर के बाहर गरुड़ की पीतल की मूर्ति है।

एक पैर पर हजार वर्ष तपस्या:

पौराणिक मान्यता के अनुसार यहां पर देवशर्मा नामक मुनि ने तपस्या की थी। मुनि ने एक हजार वर्ष तक एक पैर पर खड़े होकर देवप्रयाग में विष्णु की तपस्या की थी। भगवान विष्णु ने देवशर्मा की भक्ति से प्रसन्न हुए और वर मांगने को कहा। मुनि ने भगवान के प्रेम और कलियुग में संपूर्ण पापों के नाश करने का वर भगवान से मांगा। 

त्रेतायुग में भगवान विष्णु ने राम के रूप में जन्म लिया और रावण सहित अन्य राक्षसों का वध किया। इसके कुछ समय पश्चात भगवान राम ने यहां पर मुनि को पुनः दर्शन दिए। मान्यता है कि देव शर्मा मुनि के नाम पर ही इस स्थान का नाम देवप्रयाग पड़ा।

सीताकुटी :

एक अन्य मान्यता के अनुसार जब भगवान राम जब लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद वापस लौटे तो एक धोबी ने माता सीता की पवित्रता पर संदेह किया था। भगवान श्रीराम ने सीता जी को त्याग करते हुये वन मे जाने को कहा। लक्ष्मण सीता जी को देवप्रयाग के समीप ही वन में छोड़ आए। 

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जिस स्थान पर लक्ष्मण ने मां सीता को विदा किया था वह स्थान देवप्रयाग के निकट ही 4 किमी. की दूरी पर बद्रीनाथ मार्ग में स्थित है। इस स्थान को सीता विदा कहां जाता है। इसी के निकट ही सीता माता ने अपने युवक निवास हेतु एक कुटिया बनाई थी जिसे सीताकुटी या सीताशैण के नाम से जाना जाता है

संगम के उत्तर में गंगा के किनारे वाराह शिला, वेताल शिला, वशिष्ट तीर्थ, पौष्पमाल तीर्थ, विल्व व सूर्य तीर्थ, भरत जी का मंदिर आदि हैं। संगम के पूर्व में तुंडीश्वर महादेव हैं। अलकनंदा के किनारे एक पवित्र कुंड है। कहा जाता है कि तुंडा नामक भीलनी ने यहां लंबे समय तक शिवजी की तपस्या की थी। शिवजी ने प्रसन्न होकर तुंडा को दर्शन दिए और तुंडीश्वर नाम से प्रसिद्ध हो गए।

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