Tuesday, December 6, 2022
PilgrimageMythologyकेदारनाथ धाम : महत्व और यात्रा से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी

केदारनाथ धाम : महत्व और यात्रा से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी

केदारनाथ मंदिर

भारत के उत्तराखंड राज्य में हिमालय पर्वत की गोद में स्थित केदारनाथ मंदिर द्वादश (12) ज्योतिर्लिंगों में से एक है। केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है। कत्यूरी शैली में पत्थरों से निर्मित यह मंदिर वास्तुकला का अद्भुत नमूना है।

माना जाता है कि केदारनाथ मंदिर का निर्माण पांडवों के वंशजों द्वारा द्वापर युग में किया गया था। मान्यता यह भी है कि द्वापर काल में बना मंदिर क्षतिग्रस्त हो गया था जिसके बाद आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया।

मंदिर का निर्माण

इस मंदिर की आयु के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। मान्यता है इस मंदिर के निर्माण महाभारत काल मे पांडवो द्वारा किया गया। एक अन्य मान्यता के अनुसार वर्तमान केदारनाथ मंदिर आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा बनाया गया था। जो पांडवों और उनके वंशजों द्वारा निर्मित मंदिर के ही बगल में स्थित है।

इतिहासकारों के अनुसार इस स्थान पर एक प्राचीन मंदिर के भी अवशेष मिलते हैं। हो सकता है कि पांडवों द्वारा निर्मित प्राचीन मंदिर क्षतिग्रस्त हो गया होगा और इस स्थान पर नये मंदिर का निर्माण किया गया होगा।

मंदिर की संरचना

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केदारनाथ मंदिर 85 फीट ऊंचा, 187 फीट लंबा और 80 फीट चौड़ा है। इसकी दीवारें 12 फीट मोटी है और बेहद मजबूत पत्थरों से बनाई गई है। मंदिर को 6 फीट ऊंचे चबूतरे पर खड़ा किया गया है। मंदिर के मुख्य भाग मंडप और गर्भ ग्रह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। मंदिर के प्रांगण में नंदी बैल विराजमान है।

कत्यूरी शैली द्वारा निर्मित विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर 3581 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदिर वास्तुकला का एक अद्भुत और आकर्षक नमूना है। मंदिर के गर्भगृह में नुकीली चट्टान है, जिसकी भगवान शिव के सदाशिव रूप में पूजा की जाती है। 

केदारनाथ धाम : महत्व

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हिंदू धर्म के अनुसार केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम के दर्शनों का बड़ा ही महत्व है। जो भी व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन करता है, उसके सभी कष्ट और पापों का नाश होता है। केदारनाथ के संबंध में कहा जाता है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किए बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है उसकी यात्रा निष्फल जाती है। 

यहां के प्रतिकूल जलवायु के कारण केदारनाथ धाम अप्रैल से नवंबर माह के मध्य ही दर्शन के लिए खुलता है। मंदिर के कपाट खुलने और बंद करने का मुहूर्त निकाला जाता है। मंदिर के कपाट सामान्यतया अप्रैल माह में वैशाखी के बाद खुलते हैं, नवंबर में वृश्चिक संक्रांति से 2 दिन पूर्व बंद किए जाते हैं।

धाम के दर्शन

केदारनाथ धाम के दर्शन हेतु श्रद्धालुओं को मंदिर समिति द्वारा निर्धारित फीस जमा कराकर रसीद प्राप्त करनी होती है, उसी के अनुसार वह मंदिर में पूजा आरती अथवा भोग ग्रहण कर सकते हैं।

  • केदारनाथ धाम मंदिर आम दर्शनार्थियों के लिए प्रातः 6 बजे खुलता है।
  • दोपहर 3:00 से 5:00 बजे तक पूजा विशेष होती है, इस दौरान मंदिर आम दर्शनार्थियों के लिए बंद कर दिया जाता है।
  • पुनः शाम 5:00 बजे जनता के दर्शन हेतु मंदिर खोला जाता है।
  • 7:30 बजे से 8:30 बजे तक भगवान शिव की प्रतिमा का विधिवत श्रृंगार करके नियमित आरती होती है।
  • रात्रि 8:30 पर केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग का मंदिर बंद कर दिया जाता है।

पौराणिक मान्यताएं

महादेव थे पांडवों से नाराज

पौराणिक मान्यता के अनुसार महाभारत युद्ध के बाद पांडव गोत्र हत्या और भ्रात्र हत्या के पापों से मुक्त होना चाहते थे। श्री कृष्ण ने पांडवों को बताया कि केवल महादेव के दर्शन और आशीर्वाद से ही पांडव इस पाप से मुक्ति पा सकते हैं, अतः उन्हें महादेव की शरण में जाना चाहिए। महादेव पांडवों से राज्य पाने हेतु अपने बंधु-बांधवों का वध करने के कारण नाराज थे। इधर पांडव मन में ठान चुके थे कि उन्हें हर हाल में महादेव को पाना है।

केदारनाथ पहुंचे पांडव

जैसे ही महादेव को इस बात की खबर मिली कि पांडव उनके दर्शनों के लिये महादेव की शरण में अाना चाहते हैं तो महादेव अपना स्थान परिवर्तन करने लगे। पांडव जहां भी महादेव के दर्शन हेतु जाते महादेव वहां से अपना स्थान परिवर्तन कर देते। महादेव को ढूंढते-ढूंढते पांडव केदारनाथ आ पहुंचे। महादेव ने देखा की पांडव उन्हें ढूंढते-ढूंढते केदारनाथ तक पहुंच गए हैं तो महादेव इस स्थान पर बैल का रूप धारण कर पशुओं के झुंड में शामिल हो गए।

पांडवों ने महादेव को पहचाना

पांडव हर हाल में महादेव को पाना चाहते थे, उन्हें आशंका हुई कि महादेव पशुओं के झुंड में शामिल हो सकते है। तभी भीम दो पर्वतों पर पैर रखकर खड़े हो गये। सभी जानवर इन पर्वतों के नीचे से होकर गुजरने लगे। इस दौरान सभी पशु भीम के पैरों के नीचे से होकर गुजर गए, लेकिन महादेव को भीम के पैरों के नीचे जाना अनुचित लगा और महादेव वहीं पर खड़े हो गए। पांडवों ने महादेव को पहचान लिया।

अब महादेव रूपी बैल धरती में समाने लगे, इसी दौरान भीम ने बैल रूबी महादेव की पीठ पकड़ ली। महादेव पांडवों की इस तरह भक्ति और इच्छाशक्ति को देखकर खुश हुए और उन्होने पांडवो को इस स्थान पर दर्शन देकर उन्हें पापों से मुक्त किया।

शिव रूपी बैल जब धरती में समा रहे थे तब उनकी पीठ का भाग केदारनाथ में पिण्ड के रुप में प्रकट हुआ, सिर का भाग नेपाल में प्रकट हुआ, जिसे पशुपतिनाथ के नाम से जाना जाता है, भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इन सभी को सम्मिलित रूप में पंच केदार के नाम से जाना जाता है।

लुप्त हो जाएंगे बद्रीनाथ और केदारनाथ

पुराणों की भविष्यवाणी के अनुसार भविष्य में बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम लुप्त हो जाएंगे। भविष्य में ‘भविष्य बद्री’ नामक एक नये तीर्थ का उद्गम होगा। वर्तमान में घटित कुछ घटनाओं को पुराणों की भविष्यवाणी के सच होने के संकेतो के रूप में भी देखा जाने लगा है। भविष्यवाणी के सच होने की तरफ वैज्ञानिक और शोधकर्ता भी इशारा करते हैं।

400 साल बर्फ में दबा रहा मंदिर

केदारनाथ धाम मंदिर धार्मिक दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही साथ ही साथ यह मंदिर वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के शोध का भी विषय बना रहा। शोधकर्ताओं के अनुसार 400 साल तक बर्फ दबे होने के बाद भी यह मंदिर सुरक्षित रहा।

वैज्ञानिकों के अनुसार 13वीं से 17वीं शताब्दी यानी 400 साल तक इस क्षेत्र में एक छोटा हिम युग आया था। जिससे हिमालय की तलहटी में बसा यह क्षेत्र पूरी तरह बर्फ में दब गया। वैज्ञानिक मानते हैं जब बर्फ इस स्थान से हटी तो यहां पर अनेकों बड़े बड़े ग्लेशियरों के टूटने से मंदिर पर निशान भी बन गए लेकिन मंदिर को नुकसान नहीं हुआ। वैज्ञानिकों के अनुसार मंदिर की दीवार पर पत्थरों पर आज भी इस के निशान मौजूद हैं।

कैसे पहुंचे केदारनाथ

केदारनाथ धाम उत्तराखंड के रुद्र-प्रयाग ज़िले में में स्थित है। यह मंदाकिनी नदी के किनारे और समुद्र तल से 3,584 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। सड़क मार्ग से केदारनाथ पहुंचने के लिये ऋषिकेश सबसे पहला पड़ाव कहा जा सकता है। ऋषिकेश से गौरीकुण्ड की दूरी 76 किलोमीटर है। यहां से 18 किलोमीटर की दूरी तय करके केदारनाथ पहुंच सकते हैं।

रेमार्ग से केदारनाथ पहुंचने के लिये सबसे नजदीकी स्टेशन ऋषिकेश है। हवाई मार्ग से  केदारनाथ जाने के लिये नज़दीकी एरपोर्ट जॉली ग्रांट एरपोर्ट, देहरादून में स्थित है।

कब जाएं ?

चारधाम यात्रा हर साल अप्रैल महीने में शुरू होती है और अक्टूबर-नवंबर में खत्म हो जाती है। जून से अगस्त के बीच इस इलाके में भारी बारिश के कारण सितंबर का महीना इस यात्रा का पीक सीजन होता है। हिमालय से सटे होने की वजह से सर्दियों में केदारनाथ मंदिर के कपाट दर्शनार्थियों के लिए बंद कर दिये जाते हैं। केदारनाथ की पंचमुखी प्रतिमा को “उखीमठ” में लाया जाता हैं और यहीं पर पूजा की जाती है

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